30 अप्रैल 2025 को नई दिल्ली में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक ने भारतीय राजनीति और सामाजिक नीति के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई इस 'सुपर कैबिनेट' बैठक में देश भर में जाति जनगणना (Caste Census) करने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया। यह निर्णय आने वाले राष्ट्रीय जनगणना अभियान का हिस्सा होगा, जिसका मतलब है कि अब हर नागरिक की जाति का आंकड़ा सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बनेगा।
यह कोई छोटा-मोटा बदलाव नहीं है। पिछले कई वर्षों से विपक्षी दलों और क्षेत्रीय पार्टियों द्वारा लगाए गए दबाव के बावजूद, केंद्र सरकार ने हमेशा इससे इनकार किया था। लेकिन आज का फैसला सबके लिए चौंकाने वाला था। सवाल यह उठता है कि क्यों? विशेषकर तब जब बिहार जैसे राज्यों में चुनावी माहौल गरमा रहा है।
सामाजिक न्याय या राजनीतिक गणना?
संयुक्त मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को ब्रीफिंग देते हुए स्पष्ट किया कि सरकार ने आने वाली जनगणना में जाति आधारित गणना शामिल करने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि यह डेटा सामाजिक योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद करेगा। वहीं, गृह मंत्री और सहयोग मंत्री अमित शाह ने इसे प्रधानमंत्री मोदी का 'ऐतिहासिक निर्णय' बताया। शाह ने दावा किया कि यह कदम समाज के सभी वर्गों में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के उनके संकल्प को दर्शाता है।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर कुछ और ही कह रही है। ThePrint जैसे मीडिया हाउस ने इस फैसले को मोदी सरकार का 'यू-टर्न' (U-turn) बताया। याद रहे, 21 जुलाई 2021 को संसद में सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अलावा किसी भी अन्य जाति की जनगणना नहीं होगी। अब अचानक यह मोड़ किस कारण से लिया गया, यह सबसे बड़ा सवाल है।
विपक्ष की मांग और बिहार का कार्ड
विपक्ष, खासकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी, सालों से जाति जनगणना की मांग कर रहे थे। वे मानते थे कि बिना सटीक आंकड़ों के सामाजिक न्याय असंभव है। NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले लिया गया है, जो इसे एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चाल बनाता है।
बिहार में जाति का राजनीति पर गहरा प्रभाव होता है। यहाँ की राजनीति अक्सर जातीय समीकरणों पर टिकी होती है। जदयू (Janata Dal United) के अध्यक्ष संजय झा ने भी इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। क्षेत्रीय दलों के लिए यह डेटा उनकी वोट बैंक रणनीति को पुनर्परिभाषित कर सकता है। क्या भाजपा इस डेटा का उपयोग करके विपक्ष की सामाजिक न्याय वाली बातचीत को खत्म करना चाहती है? यह समय बताएगा।
कैबिनेट बैठक में अन्य महत्वपूर्ण फैसले
जाति जनगणना के अलावा, उसी कैबिनेट बैठक में किसानों और बुनियादी ढांचे से जुड़े दो और बड़े फैसले लिये गए, जो दिखाते हैं कि सरकार का फोकस सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है:
- मेघालय-असम हाईवे: मेघालय और असम को जोड़ने वाले एक नए राष्ट्रीय राजमार्ग पर मंजूरी मिली है। यह प्रोजेक्ट दोनों राज्यों के किसानों के लिए राहत का काम करेगा क्योंकि यह परिवहन कनेक्टिविटी को बेहतर बनाएगा।
- गन्ना किसानों के लिए घोषणा: अश्विनी वैष्णव ने गन्ना किसानों के लिए एक 'बड़ी घोषणा' का संकेत दिया, हालांकि वित्तीय विवरण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं किए गए हैं। यह कदम उत्तर भारत के कई राज्यों में किसान आंदोलनों के पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है।
इतिहास में पहली बार: पूर्ण जातिवार डेटा
भारत में पिछली बार व्यापक जाति जनगणना 1931 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। उसके बाद से, सिर्फ SC और ST की जनगणना की गई है। ओबीसी (OBC) की जनगणना राज्य स्तर पर हुई है (जैसे महाराष्ट्र और तमिलनाडु), लेकिन केंद्र स्तर पर ऐसा कभी नहीं हुआ।
आने वाली जनगणना में यह डेटा कैसे संग्रहित होगा और कब जारी किया जाएगा, इसके बारे में अभी विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन यह निश्चित है कि जब यह आंकड़े सामने आएंगे, तो वह भारत के सामाजिक स्वरूप की सबसे सटीक तस्वीर होंगे। सोशल मीडिया पर लोग चर्चा कर रहे हैं कि "किस बिरादरी के कितने लोग हैं," यह पूरा आंकड़ा सामने आएगा।
अगला क्या है?
अब देखना यह होगा कि सरकार इस डेटा का उपयोग कैसे करती है। क्या यह नई квोटा व्यवस्था का आधार बनेगा? या फिर सिर्फ विकास योजनाओं के लिए मार्गदर्शन करेगा? साथ ही, बिहार चुनावों में इस फैसले का प्रभाव कैसे पड़ता है, यह भी एक रोचक मुद्दा है। विपक्ष इसे 'चुनावी लोकप्रियता' का प्रयास कह सकता है, जबकि सरकार इसे 'सामाजिक न्याय' की जीत घोषित करेगी।
Frequently Asked Questions
जाति जनगणना से क्या तात्पर्य है?
जाति जनगणना का अर्थ है कि राष्ट्रीय जनगणना के दौरान हर व्यक्ति से उनकी जाति के बारे में पूछा जाएगा और इसका आधिकारिक रिकॉर्ड रखा जाएगा। इससे देश में हर जाति के लोगों की सटीक संख्या और वितरण का पता चल पाएगा।
सरकार ने पिछले समय में इससे इनकार क्यों किया था?
21 जुलाई 2021 को संसद में सरकार ने कहा था कि SC और ST के अलावा अन्य जातियों की जनगणना नहीं होगी। तर्क यह दिया गया था कि मौजूदा डेटा पर्याप्त है और नई जनगणना सामाजिक असंतोष पैदा कर सकती है। अब यह रुख बदलने के पीछे राजनीतिक और सामाजिक कारण हो सकते हैं।
क्या यह फैसला बिहार चुनावों से जुड़ा है?
हां, कई विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले लिया गया है। बिहार में जाति की राजनीति बहुत प्रभावशाली होती है, इसलिए यह कदम वोट बैंक को प्रभावित करने या विपक्ष की सामाजिक न्याय वाली बातचीत को कमजोर करने के लिए हो सकता है।
इस जनगणना का डेटा कब जारी होगा?
अभी तक सरकार ने डेटा जारी करने की कोई आधिकारिक तिथि नहीं बताई है। चूंकि यह आने वाली राष्ट्रीय जनगणना का हिस्सा है, इसलिए डेटा की गणना और प्रकाशन में कई महीने लग सकते हैं। आमतौर पर जनगणना के मुख्य परिणाम कई महीने बाद ही आते हैं।
क्या इससे ओबीसी कोटे बढ़ेंगे?
इसकी अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। हालांकि, जाति जनगणना का डेटा भविष्य में सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की नीतियों को समायोजित करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। यदि डेटा दिखाता है कि कुछ समुदाय पिछड़े हैं, तो नीतियों में बदलाव संभव है।