पॉलीमेटालिक नोड्यूल्स छोटे-छोटे गोल या अंडाकार गांठें होती हैं जो समुद्र की गहरी तलछट पर मिलती हैं। इनमें मुख्य रूप से मैंगनीज़, निकल, कोबाल्ट और तांबा होते हैं और कुछ में दुर्लभ धरती तत्व भी पाए जाते हैं। इन्हें कभी-कभी "डीप-सी नोड्यूल्स" कहा जाता है क्योंकि ये हजारों मीटर की गहराई पर पाई जाती हैं।
इन नोड्यूल्स की दिलचस्पी इसलिए बढ़ी है क्योंकि आधुनिक बैटरियों और इलेक्ट्रॉनिक्स में इस्तेमाल होने वाले कई महत्त्वपूर्ण धातु इन्हीं में मिलते हैं। यह मांग इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल से और बढ़ी है। नोड्यूल्स की जमा दर बेहद धीमी होती है — कुछ मिलीमीटर प्रति लाख साल — इसलिए ये स्वाभाविक संसाधन नहीं हैं जिन्हें जल्दी दोबारा बनाया जा सके।
कहाँ मिलते हैं? सबसे बड़े क्षेत्र प्रशांत महासागर का Clarion-Clipperton Zone (CCZ) है, और इसके अलावा इंडियन ओशन, अटलांटिक और कुछ अंदरूनी बेसिनों में भी नोड्यूल्स मिलते हैं। भारत ने भी केंद्रीय इंडियन ओशन बेसिन में खोज और सर्वे कराए हैं। खोज में साइड-स्कैन सोनार, सब-सी फ्लोर रोबोट और समुद्री कोरिंग का उपयोग होता है।
खनन के दो बड़े तरीक़े हैं: एक तो समुद्र तल से मशीनों से नोड्यूल्स निकालना और दूसरे में उन्हें सक्शन के जरिए सतह पर लाना। ये तकनीकें तकनीकी तौर पर संभव हैं, पर असर बड़ा हो सकता है — तलछट का फैलना, बेंटिक (तल के जीव) समुदाय का नाश, और पारिस्थितिकी में अनपेक्षित बदलाव।
नियमों की जिम्मेदारी इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (ISA) पर है जो समुद्र तल के खनन के लिए लाइसेंस और मार्गदर्शक बनाती है। अभी ISA एक्सप्लोरेशन और एक्सप्लॉइटेशन के नियमों को पुख़्ता कर रही है ताकि पर्यावरण की रक्षा और संसाधन का न्यायसंगत उपयोग सुनिश्चित हो सके। भारत और कई देश इस प्रक्रिया में शामिल हैं।
क्या खनन शुरू करना चाहिए? यह सादा सवाल नहीं है। आर्थिक फायदे आकर्षक हैं, पर पर्यावरणीय खतरे और अनिश्चितताएँ भी बड़ी हैं। इसलिए वैज्ञानिक सर्वे, पारदर्शी नीति, और कड़ी पर्यवेक्षा जरूरी है।
अगर आप इस विषय पर अपडेट चाहते हैं तो ऐसी खबरों को फ़ॉलो करें जो खोज-रिपोर्ट, ISA के फैसले और समुद्री विज्ञान के नए शोध पर हों। समझना होगा कि यह मामला सिर्फ धातु तक सीमित नहीं — यह समुद्री जीवन, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और स्थानीय व अंतरराष्ट्रीय नियमों का सवाल भी है।
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