भूतादि अमावस्या एक भूतादि अमावस्या, पितृ पक्ष के अंतिम दिन जब अंधकार और आत्माओं के साथ विशेष संबंध बनता है है। ये दिन बस एक चंद्रमा की स्थिति नहीं, बल्कि एक ऐसा समय है जब परिवार अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनके लिए श्राद्ध करते हैं, और अंधकार को स्वीकार करते हुए आत्मिक शुद्धि की ओर बढ़ते हैं। ये दिन त्योहारों की एक लंबी श्रृंखला का अंत होता है, जिसमें श्राद्ध, पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों को अर्पित किया जाने वाला धार्मिक अनुष्ठान और पितृ पक्ष, भारतीय परंपरा में मृत परिवारजनों के लिए 16 दिनों तक चलने वाला पवित्र समय शामिल हैं। इस दिन के बाद ही आता है देव दीपावली, देवताओं के लिए जलाई जाने वाली दीपों की ज्योति, जो अंधकार के बाद प्रकाश का प्रतीक है। यह बदलाव बहुत गहरा है — अंधकार की याद दिलाने के बाद, प्रकाश की मनाया जाती है।
इस अमावस्या को सिर्फ एक तिथि नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक संक्रमण माना जाता है। लोग इस दिन घर में नहीं रहते, न ही कोई नया काम शुरू करता है। बजाय इसके, वे गंगा के घाटों पर जाते हैं, दीप जलाते हैं, और अपने पूर्वजों के नाम लेते हैं। यह रिवाज़ बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के क्षेत्रों में खास तौर पर ज़ोर से मनाया जाता है। इसके बाद आने वाला देव दीपावली एक विपरीत ऊर्जा लाता है — यह दिन न सिर्फ शिव की विजय की याद दिलाता है, बल्कि गंगा के शुद्धिकरण का भी प्रतीक है। वाराणसी में एक लाख दीपों की ज्योति इसी बदलाव को दर्शाती है: जहाँ एक दिन आत्माओं को समर्पित किया जाता है, वहीं अगले दिन देवताओं का स्वागत होता है।
इस समय के बाद आने वाले त्योहारों में छठ पूजा भी शामिल है, जो सूर्य देव को समर्पित है और बिहार के लोगों के लिए एक बड़ा महापर्व है। ये सब एक ही धारा में बहते हैं — अंधकार से लेकर प्रकाश तक, मृत्यु से लेकर जीवन तक। आपको यहाँ इन्हीं त्योहारों, उनके समय, रिवाज़ और उनके बीच के गहरे संबंधों के बारे में लेख मिलेंगे। कुछ लेख देव दीपावली के घाटों की ज्योति के बारे में हैं, कुछ छठ पूजा के अर्घ्य के समय के बारे में, तो कुछ फिर उन लोगों की कहानियाँ हैं जो इन दिनों में अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध करते हैं। ये सब एक ही धारा के हिस्से हैं — जो अंधकार को समझती है, और फिर प्रकाश की ओर बढ़ती है।
चैत्र अमावस्या 2025 शनिवार, 29 मार्च को मनाई जा रही है, जो शनि अमावस्या और भूतादि अमावस्या के रूप में जानी जाती है। इस दिन ब्रह्म योग, इंद्र योग और शिववास योग का संयोग है, जो पितृ दोष निवारण और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए अत्यंत शुभ है।
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